एक हदीस के बारे में शंका का समाधान

 عن أبي ذر رضي الله عنه قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم أتاني آت من ربي فأخبرني أو قال بشرني أنه من مات من أمتي لا يشرك بالله شيئا دخل الجنة قلت وإن زنى وإن سرق قال وإن زنى وإن سرق

 

अबू ज़र (ra) से रिवायत है, उन्होने कहा कि अल्लाह के रसूल (sws) ने फरमाया, “मेरे रब की तरफ से मेरे पास एक आने वाला आया। उसने मुझे खुशखबरी दी कि मेरी उम्मत में से जिस व्यक्ति की मृत्यु इस हालत में हो कि वह अल्लाह के साथ किसी को भागी न बनाता हो तो वह जन्नत (स्वर्ग) में दाखिल होगा।” मैंने पूछा यद्यपि उसने ज़िना (व्यभिचार) और चोरी की हो? आपने फरमाया, हाँ यद्यपि उसने ज़िना और चोरी भी की हो। [Bukhari kitaab al-janaaiz, Baab 1, Hadees 1180; English Edition Volume 2: Book 23: Hadith 329]

 

कुछ हिन्दू सज्जनों की तरफ से इस हदीस के बारे में ये प्रश्न किया गया कि इसमें तो हज़रत मुहम्मद ये कहकर ज़िना (व्यभिचार) और चोरी को प्रोत्साहन दे रहे हैं, कि मुसलमान चाहे पूरी ज़िंदगी भी ये पाप करे वो स्वर्ग में जाएगा। परन्तू हदीस का ये तात्पर्य नहीं।

 

दरअसल ये शंका फहमे हदीस (हदीस समझने) के सिद्धांतों की अज्ञानता के कारण पैदा हुई है। कुछ उसूल (सिद्धान्त) आपके सामने रख देता हूँ ताकि समझने में आसानी हो। प्रथमतः ये देखना होता है कि ये हदीस किस मण्डल (किताब) के किस अध्याय (बाब) में मौजूद है। उस अध्याय का शीर्षक क्या है जिसके अंतर्गत हदीस को रखा गया है। समस्या ये है कि इंटरनेट पर जो अङ्ग्रेज़ी अनुवाद (उदाहरण: http://www.usc.edu/org/cmje/religious-texts/hadith/bukhari/) उपलब्ध है उस में केवल किताब नम्बर, उसका नाम और हदीस नम्बर दिया गया है। नाही अध्याय का शीर्षक और नाही अध्याय नम्बर दिया है। इस कारण कई गलत फहमियाँ पैदा हो गयी हैं। ये बिलकुल इसी प्रकार है जैसे वेद के किसी मंत्र का वास्तविक अर्थ उसके ऋषि, देवता और छन्द को जाने बिना नहीं हो सकता। इसके बाद हदीस में जिस विषय पर बात हुई है, उस विषय से संबधित अन्य अहदीस का भी ज्ञान अनिवार्य है। ये मैंने आपके समक्ष कुछ बुनियादी सैद्धांतिक बातें रख दीं। अब इस हदीस का वास्तविक अर्थ जानते हैं।

 

ये हदीस किताबे जनाइज़ (जनाज़े के बयान) के प्रथम अध्याय के अंतर्गत आई है और इस अध्याय का शीर्षक है من كان آخر كلامه لا إله إلا اللهअर्थात जिस व्यक्ति की अंतिम बात ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ हो अर्थात ‘अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं’

 

और इस हदीस से पहले इमाम बुखारी (बुखारी के रचयिता) ने वहब बिन मुनाब्बिह का एक क़ौल (वचन) लिखा है जिसमें उनसे पूछा गया:

 

وقيل لوهب بن منبه أليس لا إله إلا الله مفتاح الجنة قال بلى ولكن ليس مفتاح إلا له أسنان فإن جئت بمفتاح له أسنان فتح لك وإلا لم يفتح لك

 

क्या ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ जन्नत की चाबी नहीं? तो उनहों ने कहा: क्यों नहीं, लेकिन कोई भी ऐसी चाबी नहीं जिस के दाँत न हों। सो अगर तुम ऐसी चाबी लाओ गे जिसके दाँत हैं तो ताला खुले गा वरना नहीं खुले गा।

 

इस अध्याय के शीर्षक में उन कथनों की तरफ संकेत है जिन को अबू दाऊद और हाकिम ने अपनी पुस्तकों में हज़रत मुआज़ बिन जबल से हस्तांतरित किया है, जिन में ये शब्द आये हैं:

 

 من كان آخر كلامه لا إله إلا الله دخل الجنة

 

जिस व्यक्ति का अंतिम वाक्य ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ हो, वो जन्नत में प्रवेश होगा।

 

इमाम बुखारी ने अध्याय के शीर्षक में केवल من كان آخر كلامه لا إله إلا الله अर्थात जिस व्यक्ति का अंतिम वाक्य ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ हो, कहकर इस के अगले हिस्से को काट दिया है, और वहब बिन मुनब्बिह की व्याख्या को ला कर इस का अर्थ स्पष्ट किया है। कालिमा ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ जन्नत की चाबीतो है परंतु इस चाबी के काम करने के लिए इसमें दाँत भी अनिवार्य हैं। अर्थात कलिमए तौहीद (एकेश्वरावाद) के साथ जब तक आमाले सालेह (अच्छे कर्म) ना हों तो जन्नत में प्रवेश संभव नहीं।

 

ये ठीक कुरआन के अनुकूल है क्योंकि कूरआन में जगह जगह अनन्त कल्याण यानि जन्नत के लिए ईमान (सच्चा विश्वास) और अमले सालेह (नेक कर्म) को अनिवार्य बताया है। उदाहरण के लिए देखिए सूरह अल असर 103

 

 وَٱلْعَصْرِ إِنَّ ٱلإِنسَانَ لَفِى خُسْرٍ إِلاَّ ٱلَّذِينَ آمَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّالِحَاتِ وَتَوَاصَوْاْ بِٱلْحَقِّ وَتَوَاصَوْاْ بِٱلصَّبْرِ

 

गवाह है गुज़रता समय, कि वास्तव में मनुष्य घाटे में है, सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए और अच्छे कर्म किए और एक-दूसरे को सत्य की और प्रोत्साहित किया, और एक-दूसरे को धैर्य की की और प्रोत्साहित किया।

 

وإن زنى وإن سرق “यद्यपि उसने ज़िना और चोरी भी की हो” का वास्तविक अर्थ

 

इस वाक्य का अर्थ केवल इतना है यदि एक व्यक्ति का अन्त अच्छा हो और उसकी मृत्यु तौहीद पर हो तो वो स्वर्ग में प्रवेश करेगा। यद्यपि उस से चोरी और ज़ीना जैसे पाप भी हुए हों। लेकिन बाद में उस ने अपने जीवन में  सुधार कर लिया हो, और किए गए पापों से तौबा की हो। षिर्क अर्थात अल्लाह के साथ किसी को भागी न बनाना, और तौहीद पर जमे रहना यही है कि अल्लाह के आदेश का पालन किया जाये और बुराई से दूर रहा जाये। ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ का अर्थ होता है “अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं”। यदि एक व्यक्ति चोरी करता है, जो कि अल्लाह के आदेश के विपरीत है तो वो अपने नफस (जी) की पूजा करता है, उसे ही माबूद बनाता है। ये कामिल तौहीद नहीं बल्कि एक प्रकार का षिर्क है। ईमान की ये परिभाषा स्वयं पैगम्बर मुहम्मद (sws) ने की है। उनहों ने फरमाया

 

من قال لا إله إلا الله مخلصا دخل الجنة قيل: يا رسول الله، وما إخلاصها؟ قال: أن تحجزه عن محارم الله
[ المعجم الأوسط للطبراني : بَابُ الْأَلِفِ:  مَنِ اسْمُهُ أَحْمَدُ]

 

अर्थात जिसने पढ़ा ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ इख़लास (निष्ठा) के साथ, वो जन्नत में प्रवेश करेगा। पूछा गया, “हे अल्लाह के पैगम्बर, इस का इख़लास क्या है?” उनहों ने फरमाया, “कि ये कलमा उसको हराम (निषिद्ध) कार्यों से रोक दे।” [तबरानी: प्रथम बाब अलिफ: मन इस्मुह अहमद: हदीस 1258]

 

यानि यदि कोई बुरे कर्मों से अपने आप को दूर नहीं रखता उसने वास्तव में निष्ठा से कलमा नहीं पढ़ा, वो वास्तव में एकेश्वरावाद को स्वीकार नहीं करता। वास्तव में उस ने अल्लाह के साथ अपने नफस को भागी बनाया हुआ है।

 

इस व्याख्या से स्पष्ट है कि बुखारी की हदीस के बुरे अर्थ नहीं हें। लेहाजा इसको उछाल के इस्लाम को बदनाम करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

http://www.mushafiqsultan.com/questions/5-hadees-shanka-samadhan

 

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